🔱 गुरु मार्गदर्शन – साधना पथ का दीप और जीवन का प्राण 🔱

गुरवे बहुशान्तिदाता, दीपवच्च गृहे गृहे।
दुर्लभो हि गुरुः साक्षात्, गुरुदेवः सूर्यवत् प्रदीपकः॥
गुरु वह हैं जो अनेक प्रकार की शांति देने वाले हैं, जैसे प्रत्येक घर में दीपक प्रकाश देता है।
परंतु ऐसा सच्चा गुरु दुर्लभ है, जो स्वयं सूर्यवत् सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है।
गुरु का मार्गदर्शन मनुष्य जीवन में वह अमूल्य रत्न है, जो साधक को केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि भौतिक जीवन में भी स्थिरता, विवेक और दिशा प्रदान करता है। भौतिक जीवन में गुरु कर्तव्यों की मर्यादा, संबंधों की समरसता, और धन, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के संतुलन का विज्ञान सिखाते हैं। जीवन की उलझनों में जब मनुष्य भ्रमित होता है, तब गुरु ही निर्णय में स्पष्टता और हृदय में धैर्य उत्पन्न करते हैं।
आध्यात्मिक स्तर पर गुरु वह दीपक हैं जो साधक को अंधकार से प्रकाश की ओर, अविद्या से आत्मबोध की ओर, और स्वभाव से स्वरूप की ओर ले जाते हैं। वे केवल मंत्र नहीं देते, वे साधक को उस मंत्र की ज्वाला बनाते हैं। वे केवल दीक्षा नहीं करते, वे साधक को दीक्षित अवस्था में स्थिर कर देते हैं। गुरु साधना में पथ प्रदर्शक, रक्षक और शक्तिप्रदाता होते हैं। उनके बिना साधना अधूरी, अस्थिर और असुरक्षित होती है।
तंत्र और श्रीविद्या परंपरा में गुरु को मंत्रस्वरूप, यंत्रस्वरूप, और देवस्वरूप माना गया है। वे साधक के भीतर कुण्डलिनी शक्ति का नियंत्रित जागरण, चक्रों की शुद्धि, और चेतना का विस्तार करते हैं। श्रीचक्र, नवावरण, कलावाहन, तर्पण, होम — इन सबकी गति और गरिमा गुरु की कृपा से ही प्रकट होती है। गुरु के बिना साधना केवल एक विधि है; गुरु के साथ वही साधना सिद्धि बन जाती है।
गुरु – वह केंद्रबिंदु जहाँ शिष्य की यात्रा परमात्मा से एकत्व पाती है।
गुरु का अर्थ केवल एक शिक्षक नहीं होता, बल्कि वह चेतना है जो शिष्य के भीतर छिपे आत्मा के प्रकाश को प्रकट कर देती है। गुरु वह शक्ति हैं जो अनुभव से परे ज्ञान, कर्मों से परे कृपा, और संघर्षों से परे शांति प्रदान करते हैं। वे संसार में रहते हुए भी संसार के पार हैं। वे स्वयं में लीन नहीं होते, बल्कि शिष्य के भीतर परमात्मा को प्रतिष्ठित करते हैं।
जब एक साधक गुरु के सान्निध्य में आता है, तब उसके भीतर के संकोच, संशय, अहंकार और अवरोध क्रमशः जलने लगते हैं। गुरु के शब्द केवल उपदेश नहीं होते — वे बीज मंत्र होते हैं, जो हृदय की भूमि में अंकुरित होकर मुक्ति का वटवृक्ष बनाते हैं। गुरु की दृष्टि भवसागर में तैरते जीव को तट की ओर नहीं, लय की ओर ले जाती है।
न गुरोरधिकं तत्त्वं, न गुरोरधिकं तपः।
तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति, तस्मात् गुरुमुपास्यते॥
इसलिए गुरु केवल उपदेशक नहीं हैं, वे जीवनदृष्टा हैं।
वे केवल ज्ञान नहीं देते, वे साधक को स्वयं ज्ञानमय बना देते हैं।
जो गुरु के चरणों में समर्पित होता है, वह जीवन के हर स्तर पर दिव्यता का अनुभव करता है — घर हो या ध्यान, व्यापार हो या व्रत, प्रेम हो या परम।
गुरु ही वह दीप हैं जो शिष्य को तमस से ज्योति, माया से विद्या, और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाते हैं। साधना का हर मंत्र गुरु के आशीर्वाद से ही फलित होता है। बिना गुरु के तंत्र केवल क्रिया है, और गुरु के साथ वही तंत्र चैतन्य की उपासना बन जाती है।
गुरु के बिना शास्त्रों की व्याख्या अधूरी है, ध्यान दिशाहीन है, और भक्ति केवल भावनाओं की लहर है।
गुरु ही देवता का प्रवेश द्वार हैं, ज्ञान का सागर हैं, प्रेम का मूल हैं।
जो गुरु के चरणों में समर्पित हो गया, वह कभी अकेला नहीं रहता। उसका जीवन एक चलती हुई साधना बन जाता है, और उसका चित्त हर क्षण दिव्यता के आशीर्वाद में स्नान करता है।
गुरुमूलं जगत्सर्वं, गुरुमूलं तपः फलम्।
गुरुमूलं त्रयो लोका, गुरोः पारं न विद्यते॥
(गुरु ही समस्त जगत का मूल हैं, गुरु ही तप का फल हैं, गुरु ही तीनों लोकों का आधार हैं — गुरु की महिमा का कोई पार नहीं है।)
शिष्यस्य क्रियते ज्ञानं, यः स्वात्मप्रतिबोधकः।
तमहं सततं वन्दे, श्रीगुरुं करुणानिधिम्॥
(जो शिष्य के भीतर आत्मा के ज्ञान को प्रकट करता है, उस करुणामय श्रीगुरु को मैं निरंतर नमन करता हूँ।)
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