🌸 श्रीमेरु – ब्रह्मांड की जीवित ज्योति 🌸

श्रीचक्रं परमं गुप्तं, देवतानां परायणम्।
यत्र स्थाप्यते तत्र, नित्यं लक्ष्मीरधिष्ठिता॥
Śrīcakraṁ paramaṁ guptaṁ, devatānāṁ parāyaṇam।
Yatra sthāpyate tatra, nityaṁ lakṣmīr adhiṣṭhitā॥
श्रीचक्र परम गुप्त एवं देवताओं का परम आश्रय है। जहाँ इसकी स्थापना होती ह ै, वहाँ लक्ष्मी सदा वास करती हैं।
श्री मेरु, जिसे श्रीचक्र या ब्रह्मांडीय यंत्र कहा जाता है, देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का त्रैविमीय प्रतीकात्मक स्वरूप है। यह सम्पूर्ण सृष्टि का अदृश्य खाका है — जिसमें आदि शक्ति की ऊर्जा, तत्त्वों की उत्पत्ति, जीवात्मा की यात्रा और परमात्मा के साथ एकत्व की प्रक्रिया समाहित होती है। श्रीमेरु केवल पूजा का माध्यम नहीं है, यह साधक के भीतर देवी के निवास स्थान को जागृत करता है। यह यंत्र नवावरणों (९ आवरणों) में विभाजित है, और हर आवरण किसी विशेष शक्ति, योगिनी, सिद्धि या देवता का वास स्थल होता है। जब साधक नवावरण पूजन करता है, तो वह बाह्य से अंतः की ओर यात्रा करता है — शरीर से आत्मा की ओर, और आत्मा से ब्रह्म की ओर।
श्री मेरु का पहला आवरण है त्रैलोक्यमोहन चक्र, जो यंत्र की सबसे बाहरी सीमा (भूपुर) है। यह साधक के इंद्रियों को आकर्षित करता है और चित्त को स्थिर करता है। इसके भीतर स्थित है सार्वाशा परिपूरक चक्र, जो सोलह पंखुड़ियों वाला कमल है और साधक की सभी शुभ इच्छाओं की पूर्ति में सहायक होता है। तीसरा है सर्वसंकषनाशक चक्र, जो आठ पंखुड़ियों वाला है और सभी विघ्नों का नाश करता है — विशेषकर मानसिक क्लेश, भय और भ्रम को दूर करता है।
चौथा आवरण सर्वसौभाग्यदायक चक्र है, जिसमें चार त्रिकोण होते हैं और यह विशेष रूप से गृहस्थ साधकों के लिए सौभाग्य, सुख और समरसता लाता है। इसके भीतर आता है सर्वार्थसाधक चक्र, जिसमें कई त्रिकोण हैं, और यह साधक की साधना को फलित करता है — कार्य सिद्धि, संकल्प शक्ति और तपशक्ति यहाँ प्रकट होती है। छठा आवरण है सर्वरक्षाकर चक्र, जहाँ देवी की रक्षा शक्तियाँ निवास करती हैं; यह साधक के चारों ओर एक दिव्य रक्षक मंडल की स्थापना करता है।
सातवाँ है सर्वरोगहर चक्र, जो शरीर और मन के रोगों को दूर करता है। इस आवरण में आरोग्य सिद्धियाँ और शक्तियुक्त मन्त्र देवियाँ स्थित होती हैं। आठवाँ आवरण है सर्वसिद्धिप्रद चक्र, जहाँ शक्तिशालिनी योगिनियाँ वास करती हैं, जो साधक को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और तांत्रिक सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। और अंत में आता है सर्वानंदमय चक्र — श्रीचक्र का केंद्र बिंदु, जिसमें ललिता महात्रिपुरसुन्दरी स्वयं विराजमान हैं। यहाँ साधक को परमशिव के साथ अद्वैत की अनुभूति होती है; यही साधना का चरम, श्रीविद्या का सार और जीवन का परम लक्ष्य है।
श्रीमेरु स्थापना के लाभ:
-
स्थान की नकारात्मकता पूर्णतः नष्ट होती है
-
धन, सुख और सौभाग्य की स्थिरता प्राप्त होती है
-
साधना में एकाग्रता, त्वरित फल एवं आंतरिक उत्थान होता है
-
गृह, संस्था या आश्रम में दिव्यता और संतुलन का प्रवाह होता है
-
श्रीविद्या साधना के लिए यह अनिवार्य आधार होता है — देवी को आह्वान हेतु श्रीमेरु ही मुख्य पीठ होता है
संपर्क:
tel. -8590836425
South India: (Sept.-Feb)
Sri Vidyadni Peetham,
Vrindavan Retreat,
Rajiv Nagar-Mysore.
North India; (March-Augst)
Lotus Boulevard
Noida, Sector 100, Pin 201301.