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🔱 देवी प्रत्यङ्गिरा साधना – शक्ति का शुद्धतम रूप, रक्षक से ब्रह्मत्व की ओर 🔱

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देवी प्रत्यङ्गिरा साधना का गूढ़, ऊर्जावान और दिव्य शक्ति
सिंहमुखी महादेवी, रौद्ररूपा सुरार्दिनी।
प्रत्यङ्गिरे नमस्तुभ्यं, त्रैलोक्यभयनाशिनी॥

(हे सिंहमुखी, हे महादेवी, हे रौद्ररूपिणी — तीनों लोकों के भय को हरने वाली प्रत्यङ्गिरा देवी को मैं नमस्कार करता हूँ।)
 
प्रत्यङ्गिरा देवी तंत्र की वह उग्रतम एवं गोपनीय शक्तिस्वरूपिणी हैं, जो साधक के भीतर छिपी हुई भय, बाधा, आत्मविस्मृति, और नकारात्मक शक्तियों को पूर्णतः भस्म कर देती हैं। इनकी साधना एकांत, मौन और गुरुपरंपरा से ही संभव होती है। प्रत्यङ्गिरा का नाम ही संकेत करता है — "प्रति" अर्थात् विपरीत दिशा में, और "अङ्गिरा" अर्थात् अग्निशक्ति — अर्थात् जो विपरीत दिशाओं से आई हर नकारात्मक ऊर्जा को उलटकर वापस कर दे। वे श्रीनृसिंह शक्ति की अंतः ज्वाला हैं, और अपने सिंहमुख से समस्त तामसिक, अभिचारिक, एवं दुष्ट शक्तियों को विनष्ट कर देती हैं।
इस साधना में साधक देवी को "क्रोधरूपा करालवदना कालाग्निरूपिणी" के रूप में ध्यान करता है — जहाँ वह केवल रक्षक नहीं, बल्कि स्वयं काल का नियंत्रण करने वाली शक्ति के रूप में उन्हें अनुभव करता है। देवी की साधना से पहले सप्ततन्त्री, कवच, बीजमंत्र, ध्यान श्लोक, एवं यंत्र का जागरण किया जाता है। यह साधना साधक को भूत, भविष्य और वर्तमान से मुक्त करके कालातीत स्थिति में प्रतिष्ठित करती है।
यह साधना अत्यंत गोपनीय मानी जाती है, और बिना गुरु दीक्षा के इसका अभ्यास वर्जित है। प्रत्यङ्गिरा देवी को केवल तांत्रिक योग्यता, पूर्ण समर्पण और मौन साधना के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह साधना केवल शक्ति की प्राप्ति नहीं, बल्कि साधक के भीतर देवत्व की स्थापना है।
यत्र प्रत्यङ्गिरा शक्तिः साधकस्य हृदि स्थिता।
तत्र नैव भयं तस्य, न च दुष्टप्रभावतः॥
(जहाँ प्रत्यङ्गिरा की शक्ति साधक के हृदय में स्थापित हो जाती है, वहाँ उसे न कोई भय रहता है, न ही कोई दुष्टशक्ति प्रभाव डाल सकती 

🌺 प्रत्यङ्गिरा साधना के लाभ:

  • अभिचार, जादू-टोना, शत्रुबाधा, दृष्टदोष, ग्रहबाधा से रक्षा

  • साधक के चारों ओर एक शक्तिशाली प्रकाश-कवच की स्थापना

  • मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक शुद्धि

  • भय, अनिद्रा, मानसिक भ्रम, और आत्मविश्वास की कमी का नाश

  • साधना, तंत्रमार्ग और गुरु-दीक्षा में अग्निदीक्षा समान गति प्रदान करना

  • गुरु की चेतना से सीधा जुड़ाव और आत्मसत्ता की रक्षा

  • प्रत्यङ्गिरे महाशक्ते, करालवदने शिवे।
    मम चित्तं तव पादाभ्यां, युग्मं लीनं सदा भवेत्॥
    (हे महाशक्तिस्वरूपिणी प्रत्यङ्गिरा! हे करालवदना शिवे! मेरा चित्त सदा आपके चरणों में लीन बना रहे।)

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